पिंड दान पूजा

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पिंड दान पूजा ​

जब एक परिवार में एक निश्चित व्यक्ति की मृत्यु होती है और अगर उस व्यक्ति की परिसंपत्तियों के साथ संलिप्तता और बंधन होती है, संपत्ति अर्जित की जाती है और कुछ इच्छाएं मृत्यु के समय अपूर्ण हैं तो ऐसी आत्मा प्रेतयोनी में जाती है। अगर कोई अपने पित्रों का श्राद्ध नही करता है तो उनकी आत्मा प्रेत्योनी में जाती है और ऐसी आत्मा को मुक्ति प्राप्त होने के लिये पिंड दान  करते है|

क्या है पिंडदान : ‘पिंड’ शब्द का अर्थ होता है ‘किसी वस्तु का गोलाकार रूप’। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है। मृतक कर्म के संदर्भ में ये दोनों ही अर्थ संगत होते हैं, अर्थात इसमें मृतक के निमित्त अर्पित किए जाने वाले पदार्थ, जिसमें जौ या चावल के आटे को गूँथकर अथवा पके हुए चावलों को मसलकर तैयार किया गया गोलाकृतिक ‘पिंड’ होता है।

हरिद्वार में पिंडदान : हरिद्वार पिंडदान के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हरिद्वार में नारायणी शिला पर पिंडदान का महात्‍म्‍य बताया जाता है। इसीलिए पितृ पक्ष में हरिद्वार में भी बहुत से लोग आकर अपने पुरखों के लिए पिंडदान करते हैं। जहां हरिद्वार की गंगा में डुबकी लगाने ने पाप से मुक्‍ति मिलती है वहीं यहां पिंडदान करने से पित्तरों को मोक्ष मिलता है। साथ ही घर परिवार में सुख-शांति आती है

पौराणिक मान्यताएँ : पितृपक्ष वस्तुतः आत्मा के परमात्मा में एकीकरण तथा जीव और ब्रह्म के एकीकृत स्वरूप का संगम पर्व है। मान्यता है कि दिवंगत आत्मा की शांति तथा वैतरणी पार कराने के लिए पिंडदान करना आवश्यक है। इसी मान्यता के तहत लाखों लोग पितृपक्ष के मौके पर अपने पूर्वजों के पिंडदान के लिए गया आते हैं। पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग है। इस कर्म के लिए गया वह स्थान है, जहाँ पिंडदान करके लोग अपने पितरों की आत्मा को शांति दे सकते हैं। भगवान राम और सीताजी ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।

 

स्वर्ग की जनसंख्या बढ़ने लगी तथा धरती पर अनाचार बढ़ने लगा। लोग बिना भय के पाप करने लगे और गयासुर के दर्शन मात्र से पवित्र होने लगे। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए देवता ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने युक्ति भिड़ाई और गयासुर के पास जाकर बोले, ‘मुझे यज्ञ के लिए पवित्र जगह चाहिए। तुम्हारा शरीर देवताओं से भी पवित्र है। अतः तुम लेट जाओ, ताकि यह स्थान पवित्र हो जाए।’ गयासुर लेट गया। उसका शरीर पाँच कोस में फैल गया। यही पाँच कोस की जगह आगे चलकर गया बनी, पर गयासुर के मन से लोगों को पाप मुक्त करने की चाह गई नहीं और उसने वरदान माँगा कि यह स्थान लोगों को तारने वाला बना रहे। जो भी यहाँ पर किसी के तर्पण की इच्छा से पिंडदान करे, वह तर जाए।

हालाँकि इन मिथकों की सचाई का वैज्ञानिक प्रमाण लाना संभव नहीं है, पर आत्मा-परमात्मा के नियमों को समझने के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देना ही तो इस भारत भूमि की विशेषता है! यही इसकी सुगंध भी है और यही इसकी संस्कृति। यही इसका अंदाज है। अब इसे श्रद्धा कहें, अंधविश्वास कहें या फिर रहस्य। यह तो व्यक्ति की पृष्ठभूमि और प्रज्ञा पर निर्भर करता है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यही सब बातें भारत को अभी भी भारत बनाए हुए हैं।

 

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